लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के योग विभाग, फैकल्टी ऑफ योग एवं ऑल्टरनेटिव मेडिसिन के तत्वाधान में १२वे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के कार्यक्रम श्रृंखला के अंतर्गत, ध्यान पर एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में योग विभाग के कॉर्डिनेटर डॉ. अमरजीत यादव ने कहा कि वर्तमान समय में तनाव, चिंता, अवसाद एवं जीवनशैली संबंधी विकारों की बढ़ती चुनौतियों के बीच ध्यान व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक व्यायाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मन, बुद्धि और चेतना के संतुलन का विज्ञान है। ध्यान के नियमित अभ्यास से व्यक्ति की एकाग्रता, निर्णय क्षमता तथा मानसिक स्थिरता में वृद्धि होती है और वह अपने जीवन को अधिक सकारात्मक एवं उद्देश्यपूर्ण बना सकता है।कार्यशाला के मुख्य वक्ता योगाचार्य किशोर कुमार शुक्ला ने ध्यान की अवधारणा पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि ध्यान मन को बाह्य विषयों से हटाकर आंतरिक चेतना की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग में ध्यान को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है तथा यह धारणा और समाधि के मध्य की अवस्था है। ध्यान के माध्यम से व्यक्ति आत्म-जागरूकता, मानसिक शांति एवं आंतरिक संतुलन प्राप्त कर सकता है।उन्होंने ध्यान के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख करते हुए श्वास आधारित ध्यान, मंत्र ध्यान, त्राटक ध्यान, साक्षी भाव ध्यान, विपश्यना ध्यान तथा ओंकार ध्यान की विशेषताओं को सरल भाषा में समझाया। उन्होंने बताया कि प्रत्येक प्रकार का ध्यान मन और मस्तिष्क पर अलग-अलग सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है तथा नियमित अभ्यास से तनाव में कमी, भावनात्मक संतुलन, स्मरण शक्ति एवं एकाग्रता में वृद्धि देखने को मिलती है।योगाचार्य शुक्ला ने अपने व्याख्यान में योग चतुष्टय की अवधारणा को भी स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि भारतीय योग परंपरा में ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग और राजयोग को योग चतुष्टय के रूप में जाना जाता है। ज्ञानयोग विवेक एवं आत्मचिंतन का मार्ग है, भक्तियोग प्रेम एवं समर्पण का मार्ग है, कर्मयोग निष्काम कर्म के सिद्धांत पर आधारित है तथा राजयोग मन और चेतना के अनुशासन के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि ध्यान विशेष रूप से राजयोग का महत्वपूर्ण अंग है, किंतु इसका प्रभाव योग चतुष्टय के सभी मार्गों में अनुभव किया जा सकता है।मुख्य वक्ता ने प्रतिभागियों को ध्यान का व्यावहारिक अभ्यास भी कराया तथा ध्यान के दौरान शरीर की स्थिति, श्वास की जागरूकता एवं मन की एकाग्रता के महत्व को समझाया। उन्होंने बताया कि प्रतिदिन 15 से 20 मिनट का नियमित ध्यान अभ्यास मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने, कार्यक्षमता बढ़ाने तथा जीवन में संतुलन स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।कार्यक्रम का संचालन डॉ. राम किशोर द्वारा किया गया। उन्होंने विषय से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से संचालित किया। उन्होंने विद्यार्थियों से प्रतिदिन कुछ समय ध्यान के लिए निर्धारित करने का आग्रह करते हुए कहा कि ध्यान का अभ्यास न केवल शैक्षणिक एवं व्यावसायिक दक्षता को बढ़ाता है, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी सुदृढ़ बनाता है।इस अवसर पर योग विभाग के शिक्षक, छात्र – छात्राएं और योग विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
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