वाराणसी! काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय में ‘सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से काशी’ विषयक सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ मंगलवार को हुआ। कार्यशाला में काशी की बहुआयामी सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पक्षों पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान एवं विचार-विमर्श किया जाएगा। मुख्य अतिथि, कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी, ने कहा कि सांस्कृतिक विरासत कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि निरंतरता के साथ परिवर्तन की जीवंत प्रक्रिया है। इसमें समय के साथ नई धाराएँ जुड़ती रहती हैं और सांस्कृतिक प्रवाह की दिशा भी बदलती रहती है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों की पहुँच अधिक से अधिक विद्यार्थियों, शोधार्थियों और काशी में इस विषय में रुचि रखने वाले लोगों तक होनी चाहिए। उन्होंने सोशल मीडिया और ई-मेल जैसे माध्यमों के प्रभावी उपयोग पर भी जोर दिया। कुलपति ने कहा कि किसी अच्छे अकादमिक कार्यक्रम की सफलता इस बात में है कि प्रतिभागी वहाँ से कोई नई समझ, नया विचार या नया प्रश्न लेकर जाएँ। शोध के संदर्भ में उन्होंने कहा कि शोध का महत्व केवल उसके तत्काल लाभ से नहीं आँका जाना चाहिए। ईमानदारी, अकादमिक प्रतिबद्धता और नैतिक दृष्टिकोण के साथ किया गया शोध भविष्य में ज्ञान की नई संभावनाओं को जन्म देता है। प्रो. मारुति नंदन प्रसाद तिवारी, पूर्व विभागाध्यक्ष, कला इतिहास विभाग ने बीजवक्तव्य दिया। उन्होंने काशी की सांस्कृतिक विरासत को ज्ञान, भक्ति और आत्मबोध से जोड़ते हुए कहा कि काशी ऐसा स्थान है, जहाँ व्यक्ति को अपने भीतर के प्रकाश को जानने के अनेक अवसर मिलते हैं। काशी की विरासत को केवल उसके ऐतिहासिक स्थलों से नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित ज्ञान, चिंतन और जीवन-दृष्टि से समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि काशी की सांस्कृतिक चेतना व्यक्ति को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाती है। ‘हम’ की भावना से समष्टि और सर्वकल्याण का भाव विकसित होता है। काशी के घाटों को एक माला के समान बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक घाट की अपनी विशिष्ट पहचान है, लेकिन सभी मिलकर काशी की समग्र सांस्कृतिक पहचान बनाते हैं। प्रो. तिवारी ने काशी के शिव मंदिरों में पंचदेव परंपरा, काशी की उत्सवधर्मिता, संत कबीर एवं तुलसीदास की परंपरा तथा काशी-नेपाल के सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भक्ति की वास्तविक अनुभूति तब होती है, जब व्यक्ति अपने आराध्य के गुणों और आदर्शों को जीवन में आत्मसात करने का प्रयास करता है। काशी की विरासत व्यक्ति को ज्ञान, भक्ति, सेवा, समरसता और सर्वकल्याण की प्रेरणा देती है। प्रो. रीता सिंह, प्राचार्या ,महिला महाविद्यालय, ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि काशी केवल देखी नहीं जाती, इसे महसूस और जिया जाता है। उन्होंने कहा कि काशी विविधता में एकता का जीवंत स्वरूप है, जहाँ धर्म, दर्शन, साहित्य, संगीत, कला और लोकजीवन की अनेक परंपराएँ साथ-साथ विद्यमान हैं। कार्यक्रम की संयोजिका, महिला महाविद्यालय, के कला इतिहास विभाग की डॉ. आभा मिश्रा पाठक, ने काशी की धार्मिक, साहित्यिक, कलात्मक, स्थापत्य, सांगीतिक और लोक परंपराओं को इसकी जीवंत सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि काशी की विरासत केवल स्मारकों में नहीं, बल्कि यहाँ के लोगों के जीवन, भाषा, खान-पान, कला, संगीत और धार्मिक परंपराओं में भी जीवित है। कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर “सांस्कृतिक पर्यटन की दृष्टि से काशी” पुस्तक का लोकार्पण भी हुआ। पुस्तक के लेखक डॉ. आभा मिश्रा पाठक एवं डॉ. रामबाबू श्रीवास्तव हैं। पुस्तक में काशी की सांस्कृतिक विरासत और सांस्कृतिक पर्यटन के विविध आयामों को प्रस्तुत किया गया है। कार्यशाला में काशी के प्राचीन मंदिरों, स्थापत्य कला, चित्रकला, जैन एवं बौद्ध विरासत, जल-तीर्थों, संग्रहालयों तथा सांगीतिक विरासत सहित विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ व्याख्यान एवं विचार-विमर्श होंगे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. धीरज कुमार मिश्रा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. धीरेंद्र नाथ चौबे ने प्रस्तुत किया।
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