वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण में स्थित भारत कला भवन के सभागार में अपर निदेशक, बिहार संग्रहालय, पटना के अशोक कुमार सिन्हा द्वारा मिथिला चित्रकला : “रंगों और रेखाओं का सफर” पर एकदिवसीय व्याख्यान दिया गया। यह कार्यक्रम भारत कला भवन संग्रहालय के शैक्षणिक कार्यक्रम का हिस्सा है। इस कार्यक्रम कि अध्यक्षता शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भिलाई के पूर्व कुलपति तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो0 सदानंद शाही ने किया। मुख्य वक्ता अशोक कुमार सिन्हा के अनुसार, बिहार का मिथिला अपनी उच्च कोटि की सभ्यता-संस्कृति और लोक परंपराओं के लिए शुरू से विख्यात रहा है। यह षड्दर्शन टीकाकार वाचस्पति मिश्र, लक्ष्मीनाथ परमहंस, न्याय दर्शन का ज्ञान देने वाले गौतम ऋषि, न्याय शास्त्र के ज्ञाता महामहोपाध्याय शंकर मिश्र, दार्शनिक उदयनाचार्य, मंडन मिश्र, अयाची मिश्र, गार्गी, भारती, मैत्रेयी और विद्यापति जैसे विद्वानों-विदुषियों की भूमि रही है। साथ ही, यह जगतजननी सीता की जन्मभूमि और याज्ञवल्क्य की तपोभूमि है। यह क्षेत्र विभिन्न प्रकार की लोक कलाओं और शिल्प का भी केंद्र रहा है। इतिहासकार आर. सी. दत्त ने “बंगाल का साहित्य” नामक पुस्तक में लिखा है कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी के दौरान मिथिला के विदेह की कला-संस्कृति काफी उन्नत थी और उसका अंतर्देशीय एवं विदेशी व्यापार होता था। तब अंतर्देशीय व्यापार के लिए कुल आठ व्यापारिक मार्ग थे-मिथिला-राजगृह, मिथिला-श्रावस्ती, मिथिला-कपिलवस्तु, विदेह-पुष्कलावती, मिथिला-पाटलिपुत्र, मिथिला-चम्पा, सिन्धु-मिथिला और मिथिला ताम्रलिप्ति। वेणु शिल्प, सिक्की कला, पेपरमेशी, सुजनी और मिथिला (मधुबनी) चित्रकला जैसी लोककलाएँ भी इसी क्षेत्र में पनपीं और विकसित हुई। कुछ बदले हुए स्वरूप में वे लोक कलाएँ आज भी विद्यमान हैं, लेकिन मिथिला चित्रकला की बानगी ही कुछ और है। समय के निष्ठुर प्रभाव के बावजूद यह कला फीकी नहीं पड़ी अपितु अपनी आभा और कलात्मकता के साथ निरन्तर चमकती ही जा रही है। यहाँ की महिलाओं ने सदियों पुरानी अरिपन एवं कोहबर कला को आज भी मिथिला चित्रकला के रूप में जीवित रखा है। चाहे घर में नन्हे-मुन्नों का आगमन हो या शादी-विवाह का मांगलिक अवसर, पर्व, त्योहारों, उत्सवों की घड़ी हो या देव-पूजन की शुभ वेला विविध प्रकार के चित्रों से घर की दीवार तथा घर-आंगन का कोना-कोना अलंकृत करने का कार्य मिथिला की महिलाएँ सदियों से करती आ रही हैं। बिना किसी राज्याश्रय के, कला-इतिहास का ऐसा अटूट सिलसिला विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है। मिथिला की महिलाओं ने अपने चित्रकला के काम को उस स्तर तक पहुँचा दिया है कि भारत समेत पूरी दुनिया के बाजार में इसकी एक विशिष्ट पहचान बन गई है।अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में श्री शंकराचार्य प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, भिलाई के पूर्व कुलपति तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो0 सदानंद शाही ने कहा कि मिथिला चित्रकला बिहार की प्रमुख लोक कलाओं मे से एक है और इसका परिरक्षण एवं संरक्षण अनवरत किया जाना चाहिए जिससे यह लोक कला जीवंत बनी रहे। इस अवसर पर भारत कला भवन के निदेशक प्रो0 श्रीरूप रायचौधुरी, उप निदेशक डॉ0 निशांत, जन्तु विज्ञान विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर स्वाती मित्तल, दृश्य कला संकाय से डॉ0 सुरेश कुमार नायर, पालि अध्ययन एवं बौद्ध साहित्य विभाग से सहायक प्रोफेसर डॉ0 शैलेन्द्र कुमार सिंह के अतिरिक्त दृश्य कला संकाय के तकनीकी कर्मचारीगण, भारत कला भवन की सहायक संग्रहाध्यक्ष डॉ0 प्रियंका चंद्रा, डॉ0 अमरेश कुमार, सहायक प्रोफेसर, दृश्य कला संकाय तथा विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएँ एवं भारत कला भवन के समस्त कर्मचारीगण उपस्थित थे। इस कार्यक्रम का संचालन भारत कला भवन के सहायक संग्रहाध्यक्ष डॉ0 दीपक भरथन अलथुर ने एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ0 देवेन्द्र बहादुर सिंह ने किया।
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