लखनऊ। मुंबई और बिहार में विपक्ष की हार में सबसे महत्वपूर्ण रोल अदा करने वाले ओवैसी यूपी के विधानसभा चुनाव 2027 में चर्चा के बिंदु रहेंगे। ओवैसी की उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में बढ़ती हुई लोकप्रियता से समाजवादी पार्टी के रणनीतिकार तेजस्वी यादव की हार से सबक लेते हुए हर रणनीति अपनाने में मूड में सपा दिखाई दे रही है। जिससे कि अल्पसंख्यकों का शत-प्रतिशत मत सपा के पाले में आ जायें और भाजपा का मुसलमानों के वोटों में बिखराव का फार्मूला फेल हो जाये। अखिलेश यादव एक तरफ 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को और अधिक प्रभावी बनाने की तैयारी में हैं। दूसरी तरफ छोटे दलों को जोड़ने की मुहिम के संकेत मिल रहे हैं। यहां तक कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (AIMIM) के साथ गठबंधन को लेकर सपा की तरफ से सकारात्मक संकेत मिलने लगे हैं। सपा ने मंगलवार को विधानसभा चुनाव की रणनीति पर मंथन के लिए अपने सभी सांसदों की बैठक बुलाई थी। इस बैठक के बाद समाजवादी पार्टी के सांसद रमाशंकर राजभर से मीडिया ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के साथ भविष्य में गठबंधन की संभावना पर सवाल पूछ लिया। उन्होंने ओवैसी या उनकी पार्टी का नाम तो नहीं लिया लेकिन स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाजपा को हराने के लिए जो भी दल साथ आना चाहते हैं, उनका स्वागत है। राजभर का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक सपा ओवैसी की पार्टी को ‘वोट कटवा’ कहकर उनसे दूरी बनाए रखती थी। राजभर का ओवैसी से किसी तरह के तालमेल करने से इनकार नहीं करने को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। सपा सांसद के इस बयान के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सपा अब छोटे दलों को साथ लेकर एक ‘महागठबंधन’ बनाने की राह पर है ताकि भाजपा के खिलाफ एकमुश्त वोट पड़े। ओवैसी की सक्रियता को नजरअंदाज करने के बजाय उन्हें साथ जोड़कर मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर जीत पक्की करने की रणनीति भी बनाई जा रही है। राजभर के जरिए पिछड़ों और ओवैसी के जरिए अल्पसंख्यकों को एक मंच पर लाने की कोशिश हो सकती है।
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