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मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर: डॉ. मनोज गुप्ता के बायोडिग्रेडेबल बायोमैटेरियल को मिला पेटेंट

लखनऊ। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर के यांत्रिक अभियंत्रण विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मनोज कुमार गुप्ता को एक नवीन वुंड-हीलिंग (घावों के उपचार हेतु) बायोडिग्रेडेबल बायोमैटेरियल के लिए पेटेंट प्रदान किया गया है। यह विश्वविद्यालय के लिए एक महत्वपूर्ण शोध उपलब्धि है। ” ग्रीन सिंथेसाइज्ड सिल्वर नैनोपार्टिकल्स इमोबिलाइज्ड पॉली एंड नैनो सेलुलोज बेस्ड बायोकंपोजिट्स फॉर वुंड हीलिंग” शीर्षक से यह पेटेंट 16 जून, 2026 को प्रदान किया गया। इस आविष्कार को निधि मिश्रा, शगुन वर्श्नेय, अमर ध्वज, अमित प्रभाकर तथा डॉ. मनोज के. गुप्ता की शोध टीम ने विकसित किया है। इस शोध कार्य की शुरुआत वर्ष 2023 में डॉ. मनोज कुमार गुप्ता के भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईआईटी), प्रयागराज में कार्यकाल के दौरान हुई थी। एमएमएमयूटी, गोरखपुर में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति के बाद उन्होंने इस शोध को आगे बढ़ाया, जिसके परिणामस्वरूप यह पेटेंट प्राप्त हुआ। यह तकनीक मरीजों के घाव भरने में आने वाली एक महत्वपूर्ण चुनौती—माइक्रोबियल इंफेक्शन की रोकथाम—पर केंद्रित है। ऐसे संक्रमण घाव भरने की प्रक्रिया को धीमा कर सकते हैं तथा जटिलताओं के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। शोधकर्ताओं ने ग्रीन सिंथेसाइज्ड सिल्वर नैनोपार्टिकल्स और नैनोसेलुलोज को पॉली (ε-कैप्रोलैक्टोन) मैट्रिक्स में सम्मिलित कर एक बायोडिग्रेडेबल बायोकॉम्पोजिट विकसित किया है। प्रयोगशाला अध्ययनों में पाया गया कि यह सामग्री बेहतर मैकेनिकल स्ट्रेंथ के साथ-साथ स्टैफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus aureus), ईशेरिशिया कोलाई (Escherichia coli) तथा कैंडिडा एल्बिकन्स (Candida albicans) जैसे संक्रमणों के विरुद्ध प्रभावी एंटीबैक्टीरियल एवं एंटीफंगल गतिविधि प्रदर्शित करती है। यह बायोकॉम्पोजिट घाव भरने के लिए एक सुरक्षित एवं संरक्षित वातावरण प्रदान करने के साथ-साथ संक्रमण की संभावना को कम करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इसकी बायोडिग्रेडेबल प्रकृति पारंपरिक पारंपरिक ड्रेसिंग से उत्पन्न होने वाले बायोमेडिकल वेस्ट को कम करने में भी सहायक हो सकती है। दैनिक चिकित्सा उपचार में संक्रमित घावों के लिए बार-बार ड्रेसिंग बदलने और लंबे समय तक उपचार की आवश्यकता पड़ती है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की लागत बढ़ती है तथा रोगियों को अधिक असुविधा का सामना करना पड़ता है। यह पेटेंटेड बायोमैटेरियल संक्रमण-नियंत्रण क्षमता और बायोडिग्रेडेबल संरचना को एक साथ जोड़कर इन चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करता है तथा शरीर की प्राकृतिक घाव भरने की प्रक्रिया को सहायता प्रदान करता है। इस आविष्कार में सिल्वर नैनोपार्टिकल्स का उपयोग विशेष महत्व रखता है, क्योंकि सिल्वर अपनी एंटीमाइक्रोबियल विशेषताओं के लिए व्यापक रूप से जाना जाता है। इस तकनीक में नैनोपार्टिकल्स का निर्माण पर्यावरण-अनुकूल “ग्रीन” प्रोसेस द्वारा किया गया है तथा इन्हें पॉलिमर और नैनोसेलुलोज आधारित बायोडिग्रेडेबल सामग्री में सम्मिलित किया गया है। परिणामस्वरूप विकसित बायोकॉम्पोजिट संक्रमण के विरुद्ध बेहतर सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ डिस्पोजेबल वाउंड-केयर उत्पादों से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को भी कम कर सकता है। यह पेटेंटेड तकनीक बायोमैटेरियल्स और वाउंड-केयर रिसर्च के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतिनिधित्व करती है तथा इसके हेल्थकेयर और बायोमेडिकल इंडस्ट्री में व्यापक अनुप्रयोग की संभावनाएँ हैं। इस उपलब्धि पर डॉ. मनोज कुमार गुप्ता एवं उनकी सह-आविष्कारक टीम को बधाई देते हुए माननीय कुलपति प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा ने कहा, “यह पेटेंट हमारे शिक्षकों द्वारा किए जा रहे उच्च गुणवत्ता वाले शोध और नवाचार का उत्कृष्ट उदाहरण है। हेल्थकेयर क्षेत्र में संभावित उपयोग वाले एक बायोडिग्रेडेबल वाउंड-हीलिंग बायोमैटेरियल का विकास दर्शाता है कि वैज्ञानिक अनुसंधान किस प्रकार वास्तविक जीवन की चुनौतियों के समाधान में योगदान दे सकता है। मैं डॉ. मनोज कुमार गुप्ता और पूरी शोध टीम को इस उपलब्धि के लिए हार्दिक बधाई देती हूँ तथा उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूँ।”

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