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गाजीपुर में निर्णायक मतदाता होने के बावजूद आजादी से लेकर आजतक राजनीति के हासिए पर हैं दलित नेता

शिवकुमार

गाजीपुर। गाजीपुर जिले में दलित मतदाताओं की निर्णायक संख्‍या होने के बावजूद आजादी से लेकर आजतक बसपा, सपा, भाजपा, कांग्रेस आदि दलों ने दलित समाज के नेताओं को हमेशा हासिए पर रखा। गाजीपुर के सातों विधानसभाओं में किसी विधानसभा में नम्‍बर-1 पर तो किसी में नम्‍बर-दो पर दलित मतदाता हैं। इसके बावजूद राजनीतिक दल केवल वोट लेने के लिए उन्हे गले लगाते हैं इसके बाद हासिए पर डाल देते हैं। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी ने देउराम और सपा ने रामधनी राम को राज्‍यमंत्री बनाया। इसके बाद किसी भी राजनीतिक दल ने दलित नेताओं को आगे बढ़ने का मौका नही दिया जिससे वह गाजीपुर का नाम प्रदेश और देश में कर सके। बसपा के जिलाध्‍यक्ष अजय भारती के अनुसार सदर विधानसभा में 65 हजार, जंगीपुर में 80 हजार, सैदपुर में 1 लाख 5 हजार, जखनियां में 1 लाख, जमानिया में 80 हजार, मुहम्‍मदाबाद में 90 हजार और जहुराबाद में 96 हजार मतदाता हैं। लेकिन आपसी मतभेद के चलते यहां के दलित नेता अपना प्रदेश में वर्चस्‍व नही बना सके। बसपा के वरिष्‍ठ नेता गुड्डू राम ने बताया कि दलित नेताओं में आपसी मतभेद एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति से यहां के नेता आगे नही बढ़ सके। सभी  दलों ने केवल इनका यूज करके फिर हासिए पर फेंक दिया। जब भी दलित नेताओं को विधायक बनने का मौका मिलता है तो वह अपना पूरा कार्यकाल अपने विकास और अपना टिकट बचाने की युक्ति में लगा देता है जिससे समाज का भला नही हो पाता है।

 

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