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गाजीपुर: सरसों की फसल कों माहूँ कीट से बचायें- प्रो. रवि प्रकाश     

गाजीपुर। सरसों की फसल इस समय प्रौढ़ा अवस्था में है। फूलों से भरा है। फूलों पर आकर्षित होते है माहूँ कीट। प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी देवरिया के निदेशक प्रो. रवि प्रकाश मौर्य ने बताया कि प्रौढ़ कीट हल्के हरे या स्लेटी रंग के होते हैं, जो या तो पंख रहित या पंख वाले  होते हैं और लगातार शिशु पैदा करते रहते हैं। सरसों के माहू कीट का जीवन चक्र बहुत तेज़ होता है, जिसमें मादा बिना निषेचन के सीधे बच्चे देती है जिससे इनकी संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ती है, जो दिसम्बर से मार्च तक सक्रिय रहते हैं, पत्तियों और कलियों से रस चूसकर पौधे को कमजोर करते हैं और मीठा स्राव छोड़ते हैं जिससे काले फफूंद लगते हैं, और इनका जीवनकाल छोटा होने के बावजूद, ये तेज़ी से प्रजनन कर फसल को भारी नुकसान पहुँचाते हैं। जीवन चक्र के चरण में सर्दियों में मादाएं सरसों की पत्तियों की नसों पर अंडे देती हैं, या कभी-कभी सीधे बच्चे देती हैं। अंडों से निकलने के बाद ये शिशु (निम्फ) बनते हैं, जो पंखहीन या पंख वाले हो सकते हैं, और 3-6 दिनों में बड़े हो जाते हैं। कभी-कभी 24 घंटे में ही हजारों बच्चे हो जाते है।इनकी संख्या दिसम्बर से मार्च तक सबसे अधिक होती है, और ठंडे, बादल वाले मौसम में इनकी वृद्धि तेज़ होती है। शिशु तथा प्रोढ़ पौधे का रस चूसते हैं, जिससे पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं, पौधे कमजोर हो जाते हैं, और फलियों में दानों की कमी आती है। इनके द्वारा छोड़े गए मीठे रस पर काले फफूंद  उग जाते हैं, जो प्रकाश संश्लेषण को रोकते हैं।  आमतौर पर किसान इनसे बचने के लिए महंगे और जहरीले रसायनों का छिड़काव करते हैं. इससे न केवल खेती की लागत बढ़ती है, बल्कि रसायनों के अवशेष हमारे खाने के जरिए शरीर में पहुंचकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। रसायनों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए ‘स्टिकी ट्रैप’ एक बिना केमिकल वाली आधुनिक तकनीक है. स्टिकी ट्रैप दरअसल एक रंगीन प्लास्टिक या कार्डबोर्ड की शीट होती है, जिस पर एक खास चिपचिपा पदार्थ लगा होता है. कीट विज्ञान के अनुसार, हर कीट किसी विशेष रंग की ओर आकर्षित होता है. सरसों का माहू कीट पीले रंग की ओर खिंचा चला आता है. जब किसान अपने खेत में सरसों की फसल से 1-2 फीट की ऊंचाई पर ये पीले स्टिकी ट्रैप लगाते हैं, तो माहू कीट पीले रंग को देखकर उसकी ओर भागते हैं और उस पर लगे गोंद से चिपक कर मर जाते हैं. इस विधि से बिना किसी कीटनाशक के कीटों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। बाजार में तो स्टिकी ट्रैप मिलते ही हैं, लेकिन किसान इसे बहुत कम खर्च में घर पर भी तैयार कर सकते हैं. इसे बनाने के लिए किसी पीली पॉलीथीन या टीन की शीट पर अरंडी (रेड़ी) का तेल या पुराना मोबिल ऑयल लगा दें. एक ट्रैप बनाने में मात्र 15 से 20 रुपये का खर्च आता है. एक एकड़ सरसों की फसल के लिए 10 से 15 स्टिकी ट्रैप काफी होते हैं। स्टिकी ट्रैप का इस्तेमाल करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. ट्रैप को हमेशा फसल की ऊपरी सतह से एक-दो फीट ऊपर बांधना चाहिए और हर 20-25 दिन में जब शीट कीटों से भर जाए, तो इसे बदल देना चाहिए या 5 मिलीलीटर नीम के तेल में कुछ बूंदें शैम्पू मिलाकर 1 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। या 50 ग्राम नीम के बीज को कूटकर 1 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।कीटों से  प्रभावित पत्तियों और टहनियों को तोड़कर नष्ट करें। यदि आप जैविक विधि किसी कारण से नही अपना पा रहे हे तो बहुत आवश्यकता है होने पर रासायनिक नियंत्रण करें। इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 1 मिली प्रति 3 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। छिड़काव का सही समय का ध्यान रखना आवश्यक है। माहू का प्रकोप फूल आने के समय और मौसम में नमी होने पर बढ़ता है जो जनवरी-फरवरी माह होता है। मधुमक्खियों को बचाने के लिए शाम 4-5 बजे के बाद ही रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करें।  छिड़काव के बाद छिड़काव यंत्र की सफाई कर रखे तथा स्वयं साबुन लगाकर स्नान करें।

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